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बारिश में डूबा शहर, नदी में बहे गाँव – अब भी हम नहीं जागे?

कोलकाता हमेशा से एक नीची ज़मीन पर बसा शहर रहा है। समुद्र तल से शहर के कई हिस्से सिर्फ़ डेढ़ मीटर ऊपर। मानसून के दौरान जब गंगा उफान पर থাকে, तब शहर का बारिश का पानी आसानी से बाहर नहीं निकल पाता।

ऊपर से तेज़ जनसंख्या বৃদ্ধি और अनियंत्रित कंस्ट्रक्शन — तालाब पाटे जा रहे हैं, नालियाँ प्लास्टिक से भरी हैं, रास्ते अतिक्रमण की वजह से तंग। ऐसे में 5-6 घंटे की तेज़ बारिश में पानी रुकेगा ही — और बाढ़ जैसे পরিস্থিতि তৈরি হবে।

फिर क्या होता है? लोग वीडियो बनाते हैं, सोशल मीडिया पर पोस्ट करते हैं। कुछ लोग सरकार को कोसते हैं, कुछ इसे 'कोलकाता का लंदन बनना' कहते हैं। कई राजनीतिक समर्थक लिखते हैं, “2026 में इनको हटाओ नहीं तो सब डूब जाएगा!”

लेकिन क्या सिर्फ़ सरकार ही दोषी है? नहीं। सरकार की ज़िम्मेदारी অবশ্য है — पर कोलकाता जैसे शहर के इंफ्रास्ट्रक्चर को ठीक करने के लिए जिन योजनाओं की ज़रूरत, वो अभी तक अधूरी हैं या लागू ही नहीं हुईं।

पर ये मत भूलिए, डबल इंजन सरकार वाले राज्यों में भी यही हाल है — मुंबई, दिल्ली, पटना, हैदराबाद, लखनऊ, सूरत — कौन सा शहर है जहाँ बारिश में पानी नहीं भरता?

शहर की बाढ़ की चिंता ज़रूरी है, पर कभी आपने सोचा है उन गांवों के बारे में जो हर साल पद्मा, भागीरथी या अन्य नदियों की कटाव में बह जाते हैं? हज़ारों लोग — बूढ़े, बच्चे, महिलाएं — एक बर्तन तक साथ नहीं रख पाते, सिर पर छत नहीं होती, खेत-खलिहान सब नदी में समा जाता है।

शहर की परेशानी अस्थायी है, पर उन ग्रामीणों की ज़िंदगी कभी भी पहले जैसी नहीं हो पाएगी।

आइए, इस आपदा को राजनीति का विषय न बनाकर, नागरिक और इंसान के नाते सरकार का सहयोग करें। जागरूक हों, और दूसरों को भी करें — ताकि हम मिलकर ऐसे संकटों से लड़ सकें।

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