एक भूला हुआ प्रसंग: नेताजी और हरगोविंद सिंह की ऐतिहासिक नीलामी
26 जनवरी, 1944। स्थान— रंगून म्यूनिसिपल बिल्डिंग।
आजाद हिंद फौज के सर्वोच्च सेनापति नेताजी सुभाषचंद्र बोस का अभिनंदन समारोह। मंच पर नेताजी को माल्यार्पण किया गया। भाषण में नेताजी ने भावुक होकर कहा—
“बंधुगण,
आपके इस स्नेह से मैं अभिभूत हूँ। पर मेरी एक प्रार्थना है—
यह माला जिसे आपने मुझे पहनाया है, मैं इसे नीलाम करना चाहता हूँ। और उससे जो धन प्राप्त होगा, वह आजाद हिंद फौज के कोष में जाएगा।”
नीलामी शुरू हुई।
सबसे पहले एक युवा सिख—हरगोविंद सिंह—ने बोली लगाई ₹1 लाख। तुरंत व्यापारी बृजलाल ने ₹2 लाख बोली लगाई। बोली बढ़ती रही—3, 4, 5, 6, 7, 8, 9 लाख। हरगोविंद ने बोला लगाया ₹10 लाख, मगर बृजलाल ने पलटवार किया—₹20 लाख।
हरगोविंद के पास और धन नहीं था। उसके पास केवल एक मकान और दो ट्रक थे। उसने वे भी दान में दे दिए। लेकिन बृजलाल ने दो जहाजों का दान कर दिया। सबको लगল कि माला बृजलाल को ही मिलेगी।
तभी नेताजी ने हरगोविंद को बुलाया। बृजलाल की ओर देखते हुए बोले—
“बृजलाल, तुम्हारे पास बहुत कुछ है। तुमने उसका एक अंश दिया है। लेकिन हरगोविंद ने अपना सर्वस्व दे दिया—अपना घर भी। अतः यह माला हरगोविंद का ही अधिकार है।”
बृजलाल अपनी भूल समझ गया। हरगोविंद की आँखें नम हो गईं। नेताजी ने उसे सीने से लगा लिया और अपने गले की माला उसके गले में डाल दी।
यह प्रसंग आज इतिहास के पन्नों में फुटनोट बनकर रह गया है, जबकि यह देशभक्ति और बलिदान का अनुपम उदाहरण है।