जली हुई रोटी और पूर्णिमा की रात” — डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम की माँ को अमर श्रद्धांजलि
विशेष रिपोर्ट – (ऑनलाइन बंगदर्पण)
“जब मैं छोटा था, मेरी माँ हमारे लिए खाना बनाती थीं। दिनभर कड़ी मेहनत करने के बाद वह रात का भोजन तैयार करतीं। एक रात उन्होंने पिताजी को सब्ज़ी और पूरी तरह जली हुई रोटी परोसी। मैं पिताजी की प्रतिक्रिया देखने के लिए उत्सुक था। लेकिन उन्होंने बिना कुछ कहे रोटी खा ली और मुझसे मेरे स्कूल के दिन के बारे में पूछा।
मुझे याद नहीं कि मैंने क्या उत्तर दिया, लेकिन मुझे याद है कि माँ ने पिताजी से जली हुई रोटी देने के लिए माफ़ी माँगी। पिताजी मुस्कुराए और बोले, ‘प्रिय, मुझे तो जली हुई रोटी ही पसंद है।’
उस रात जब मैंने उन्हें शुभरात्रि कहा तो मैंने पूछा कि क्या उन्हें सचमुच जली हुई रोटी पसंद है। पिताजी ने मुझे गले लगाकर कहा, ‘तुम्हारी माँ ने पूरा दिन काम किया और वह बहुत थक गई थीं। एक जली हुई रोटी से कोई दुखी नहीं होता, लेकिन कठोर और कटु शब्द दिल को चोट पहुँचाते हैं। याद रखो, जीवन अपूर्ण चीज़ों और अपूर्ण लोगों का संगम है। मैं भी पूर्ण नहीं हूँ। सबकी तरह मैं भी जन्मदिन और सालगिरह भूल जाता हूँ। जीवन ने मुझे यही सिखाया है कि हमें एक-दूसरे की गलतियों को स्वीकार करना चाहिए और रिश्तों को संजोना चाहिए। जीवन बहुत छोटा है; पछतावे के साथ उठने का कोई अर्थ नहीं। जो लोग तुम्हें महत्व देते हैं, उनसे प्रेम करो और जो नहीं देते, उनके प्रति भी सहानुभूतिशील रहो।’
साल था 1941। दूसरा विश्व युद्ध चल रहा था। हम रामेश्वरम में रहते थे और परिवार कठिन दौर से गुजर रहा था। मेरी उम्र मात्र 10 वर्ष थी। युद्ध की गूँज कोलंबो से रामेश्वरम तक पहुँच चुकी थी—खाने-पीने से लेकर रोज़मर्रा की चीज़ों तक हर जगह कमी थी।
हम पाँच भाई और पाँच बहनें थे। दादी और माँ मिलकर इस विशाल परिवार को सँभालती थीं।
मैं रोज़ सुबह चार बजे उठकर गणित शिक्षक के पास जाता था, जो हर साल केवल पाँच बच्चों को निःशुल्क पढ़ाते थे। मेरी माँ, अशियम्मा, मुझसे पहले उठ जातीं, मुझे तैयार करके भेजतीं। साढ़े पाँच बजे लौटने के बाद मैं तीन किलोमीटर दूर रेलवे स्टेशन जाता था। युद्धकाल में ट्रेन स्टेशन पर नहीं रुकती थी, बल्कि चलती ट्रेन से अख़बार के बंडल फेंक दिए जाते थे। मेरा काम था उन बंडलों को पकड़ना और पूरे शहर में वितरित करना।
अख़बार बेचने के बाद मैं आठ बजे घर लौटता और नाश्ता करता। माँ मुझे थोड़ा अतिरिक्त देतीं क्योंकि मैं पढ़ाई और काम दोनों करता था। शाम को स्कूल के बाद ग्राहकों से बकाया वसूलने जाता।
एक दिन रात के खाने पर माँ मुझे बार-बार रोटी देती रहीं और मैं खाता गया। बड़े भाई ने बाद में कहा, ‘कलाम, तुम खाते रहे और माँ ने अपनी सभी रोटियाँ तुम्हें दे दीं। उन्होंने खुद कुछ नहीं खाया। यह अभाव का समय है, जिम्मेदार बनना सीखो।’ यह सुनकर मैं काँप उठा और तुरंत माँ को गले लगा लिया।
हमारे घर में बिजली नहीं थी। मिट्टी के तेल का दिया जलता था, वह भी सिर्फ शाम सात से नौ बजे तक। माँ ने मुझे एक छोटा दिया दिया था ताकि मैं रात 11 बजे तक पढ़ सकूँ। आज भी मेरी आँखों में पूर्णिमा की रोशनी में माँ का चेहरा झलकता है।
मेरी माँ 93 वर्ष तक जीवित रहीं। वह प्रेम और दया की मूर्त थीं। आज भी मैं आधी रात को उठकर रो पड़ता हूँ, याद करता हूँ जब भाई-बहनों की ईर्ष्यालु नज़रों के सामने माँ की गोद में सिर रखकर सोता था।
उनका प्यार, उनका स्नेह और उनका विश्वास मुझे शक्ति देता रहा। उनके हाथ मेरे हर दुख को दूर कर देते थे और मुझे सिखाते थे कि विश्वास की ताकत से डर को कैसे जीतना है।”
[स्रोत: ए. पी. जे. अब्दुल कलाम की आधिकारिक वेबसाइट से संक्षिप्त अनुवाद]