फासीवाद: दर्शन, आदर्श और अभ्यास - एम एन राय का चिंतन
1938 में एम एन राय की पुस्तक 'फासीवाद: इसका दर्शन, आदर्श और अभ्यास' प्रकाशित हुई थी। इसका हिंदी अनुवाद "फासीवाद: दर्शन, आदर्श और अभ्यास" के नाम से देशब्रती प्रकाशन से पहली बार प्रकाशित हुआ। मूल लेख के साथ राय के फासीवाद-विरोधी प्रचार पत्र और दो महत्वपूर्ण भाषण भी संलग्न किए गए हैं। अंत में, 1991 में सीपीआईएमएल लिबरेशन द्वारा प्रकाशित कम्युनिस्ट आंदोलन का इतिहास पहले खंड से एम एन राय का संक्षिप्त जीवनी भी जोड़ा गया। दीपंकर भट्टाचार्य का लिखा प्रस्तावना पुस्तक की विषयवस्तु को और अधिक प्रासंगिक और समकालीन बना देता है।
एम एन राय ने यूरोप में उत्पन्न फासीवाद को गहराई से समझते हुए भारत के ब्राह्मणीवादी समाज को भी फासीवाद के लिए उर्वर भूमि के रूप में पहचाना। जेल में रहते हुए उन्होंने अपनी नोटबुक में लिखा था, "सनातनी राष्ट्रीयतावाद के भगवा ध्वज के नीचे स्वराज और रामराज्य नहीं, बल्कि हिटलरशाही के रूप में परिणत होने की संभावना अधिक है।" यह पुस्तक वर्तमान भारतीय संदर्भ में अत्यधिक प्रासंगिक और समय की मांग है।