32 वोटों की हार या लोकतंत्र की हार? ब्रिजेंद्र सिंह का संघर्ष
हरियाणा के उचाना विधानसभा सीट से कांग्रेस उम्मीदवार और पूर्व IAS ब्रिजेंद्र सिंह सिर्फ 32 वोटों से चुनाव हार गए। कुल 1,377 बैलट वोटों में से 215 को अंतिम क्षणে अवैध घोषित किया गया। शेष 1,158 में ब्रिजेंद्र को 636 वोट मिले।
उन्होंने इन 215 वोटों की समीक्षा और पुनर्गणना की मांग की। लेकिन भाजपा के विजयी प्रत्याशी ने हर तरीके से इसकी जांच को रोकने की कोशिश की।
सवाल उठता है — अगर जीत पक्की है, तो जांच से डर कैसा?
जब बीजेपी खुद को “विश्व की सबसे बड़ी पार्टी” कहती है, और प्रधानमंत्री 2047 तक सत्ता में रहने की बात करते हैं, तब ऐसी बचाववादी राजनीति चिंताजनক।
चंडीगढ़ के मेयर चुनाव में हमने देखा — गणना अधिकारी ने खुद बैलट पर निशान लगाकर वोट को अवैध किया था। वह सीसीटीवी में पकड़ा गया और अदालत ने हारे हुए उम्मीदवार को वास्तविक विजेता घोषित किया।
वोट चोरी अब सिर्फ बूथ लेवल पर नहीं — अब ये नतीजों के स्तर तक पहुंच चुकी है। कहीं जीते हुए उम्मीदवार की जगह हारे को प्रमाणपत्र, कहीं फॉर्म-20 में छेड़छाड़, कहीं निष्पक्ष अधिकारियों का दमन।
2018 के गुजरात विधानसभा चुनाव में 20 से अधिक सीटों पर चुनावी याचिकाएं हुईं — लेकिन सुनवाई 5 साल तक चली।
इन सबके बीच पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट ने एक मिसाल कायम की है। सिर्फ एक साल में पूरी सुनवाई कर अब फैसला सुनाने जा रहा है। यह लोकतंत्र की रक्षा में एक सराहनीय कदम है।
कल, 23 सितंबर, का दिन भारतीय चुनावी इतिहास के लिए अहम हो सकता है।